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MADHYAPRADESH KI AWAZ मध्‍यप्रदेश की आवाज

ग्‍वालियर भिण्‍ड मुरैना और पन्‍ना के स्‍थानीय निवासीयों द्वारा प्रकाशित, ग्‍वालियर टाइम्‍स डॉट कॉम की आधिकारिक स्‍पेस
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December 05

चुनाव में संचार तंत्र की मजबूती का असर अपराधों में आई भारी कमी वक्त पर लिया गया एक्शन

चुनाव में संचार तंत्र की मजबूती का असर अपराधों में आई भारी कमी वक्त पर लिया गया एक्शन

भोपाल : चार दिसम्बर, 2008

मध्यप्रदेश में 13वीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने अपने विभिन्न नए प्रयोगों की कड़ी में इस बार तगड़े संचार तंत्र की योजना भी तैयार की थी। मतदान केन्द्र से लेकर आयोग तक जुड़े कम्यूनिकेशन के तारों ने पूरी मशीनरी को चौकस और मुस्तैद कर दिया था। पल-पल में सूचनाओं के आदान-प्रदान का आसान और माकूल बंदोबस्त किया गया था। इसके चलते वक्त पर हर एक्शन लिया जाना मुमकिन हो सका। इस कोशिश का सुखद नतीजा यह रहा है कि चुनाव के दौरान होने वाले अपराधों में पिछले चुनाव की तुलना में इस बार भारी कमी आई है।

चुनाव के दौरान इस बार आयोग ने एक और नए प्रयोग के तहत सूचना तंत्र को इसलिए मजबूत कर दिया था ताकि सारी परिस्थितियों पर समग्र विचार और इसके अनुरूप तत्काल कार्रवाई अंजाम देने में सहूलियत हो जाए। संचार सुविधा के आधुनिकतम साधनों में लैंड लाइन फोन, मोबाइल फोन, फैक्स और वायरलेस का भरपूर इस्तेमाल करने की रणनीति तैयार की गई थी। सूचना तंत्र के विस्तृत दायरे में मतदान केन्द्र, करीबी थाना, जोनल अफसर, सेक्टर मजिस्ट्रेट, मतदान केन्द्र के क्षेत्र में रहने वाले भरोसेमंद व्यक्ति जिला निर्वाचन अधिकारी, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी और चुनाव आयोग आपस में जुड़े हुए थे। मैदानी अफसरों को मोबाइल फोन के इस्तेमाल के लिए कुल 13 लाख 72 हजार 500 रुपए भी मंजूर किए गए थे।

संचार तंत्र के त्वरित और सटीक इस्तेमाल से आयोग के निर्देश पर मुनासिब एक्शन लिया जाना पुलिस और प्रशासन के लिए भी मददगार बना। अगर पिछले चुनाव से ही तुलना करें तो वर्ष 2003 में जहाँ चुनावी हिंसा की 195 वारदातें हुई थीं, इस बार ये 65 पर सिमट आईं। इसी तरह उस वक्त जहाँ 4 लोग मारे गए थे और 239 जख्मी हुए थे, इस बार केवल एक मृत्यु का मामला सामने आया है और 83 लोग जख्मी हुए हैं। यही स्थिति संपत्ति को हुए नुकसान की है जबकि पिछले चुनाव में जहाँ कुल 3 लाख 99 हजार 700 रुपए की संपत्ति को नुकसान पहुँचा था वहीं इस बार सिर्फ 70 हजार रुपए मूल्य की संपत्ति को क्षति हुई।

चुनावी अपराधों पर काबू रखने की कार्रवाई 2 महीने पहले ही शुरू कर दी गई थी। चुनाव आयोग ने बाकायदा इसके लिए वक्त-वक्त पर हिदायतें दीं और इसके लिए रणनीतियाँ भी तय कीं। इसके नतीजे में पिछले चुनाव में जहाँ कानून की विभिन्न धाराओं के तहत 1 लाख 99 हजार 205 अपराधियों को प्रतिबंधित किया गया था वहीं इस चुनाव में 3 लाख 33 हजार 531 अपराधियों को प्रतिबंधित किया गया। इसी तरह उस चुनाव में जहाँ 34 हजार 75 गैर जमानती वारंट तामील कराए गए थे वहीं इस बार इनकी तादाद 38 हजार 48 थी। यही स्थिति लायसेंसशुदा हथियारों को जमा कराने, कब्जे में लेने या निरस्त करने के मामलों में भी थी जबकि पहले जहाँ यह कार्रवाई ऐसे 1 लाख 76 हजार 169 हथियारों के लिए की गई थी, इस बार 2 लाख 17 हजार 720 हथियारों को लेकर की गई।

गैरकानूनी हथियार बनाए जाने के 107 ठिकानों पर पिछले चुनाव के दौरान छापे डालकर इनकी बरामदगी की गई थी, इस बार यह कार्रवाई 224 ठिकानों पर की गई। इसी तरह पहले जहाँ 2874 गैर लायसेंसी विभिन्न हथियार जप्त किए गए थे, इस बार 3208 ऐसे हथियार जप्त किए गए। पिछले चुनाव के दौरान जहाँ गैरकानूनी रूप से जमा 1512 गोलियाँ और विस्फोटक पदार्थ तलाशी में पाए गए थे, इस बार सघन और कड़ी कार्रवाई के चलते अपराधी पस्त हुए तथा व्यापक तलाशी और छापों में 795 गोलियाँ और विस्फोटक पदार्थ गैर कानूनी कब्जे से जप्त किए गए।   

 

विधि सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम, 1987 में संशोधन

विधि सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम, 1987 में संशोधन

सबको न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संविधान में प्रतिष्ठापित आदर्शों और आकांक्षाओं के पालन में, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने मौजूदा विधि सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम, 1987 में संशोधन करने का फैसला किया है । एक लाख बीस हजार रुपये तक की सालाना आय वाले वरिष्ठ नागरिकों, रक्षा बलों के जवानों के परिवार के आश्रित सदस्यों, तथा अन्य सशस्त्र बलों के जवानों (जिन्हें केन्द्र सरकार अधिसूचना के जरिए निर्दिष्ट कर सकती है तथा जो आतंकवादीकार्रवाई या दंगों में मारे गए या शिकार हो) को विधि सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के तहत नि:शुल्क विधि सेवाओं के लिए योग्य व्यक्तियों की श्रेणी में शामिल करने के लिए विधि सेवाएं प्राधिकरण (संशोधन) विधेयक, 2008 पेश किया जाएगा ।          

 

विदेशी समाचार पत्रिकाओं के भारतीय संस्करणों के प्रकाशन संबंधी दिशा-निर्देश

विदेशी समाचार पत्रिकाओं के भारतीय संस्करणों के प्रकाशन संबंधी दिशा-निर्देश

       केन्द्र सरकार ने समाचार और सार्वजनिक समाचारों पर टीका-टिप्पणियों संबंधी विदेशी पत्रिकाओं के भारतीय संस्करणों के प्रकाशन की अनुमति देने का फैसला किया है । समाचार और करंट अफेयर्स श्रेणी में आने वाली विदेशी पत्रिकाओं को भारतीय प्रकाशक विदेशी निवेश या उसके बिना प्रकाशित कर सकेंगे । सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से समय-समय पर जारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी मार्ग-निर्देशों के प्रावधानों के अनुसार कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अधिकतम सीमा 26 प्रतिशत होगी ।

 

       इस श्रेणी मे सिर्फ वही पत्रिकाएं शामिल होंगी जो दैनिक नहीं हैं और समाचार या सार्वजनिक समाचारों पर टिप्पणियां करती हैं । इसके तहत कोई भी भारतीय कम्पनी विदेशी पत्रिकाओं के भारतीय संस्करण प्रकाशित कर सकेगा लेकिन वह भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत होना चाहिए । आवेदक भारतीय कंपनी के निदेशक बोर्ड में कम-से-कम तीन-चौथाई निदेशक तथा सभी प्रमुख कार्यकारी अधिकारी और संपादकीय कर्मचारी भारतीय होने चाहिए ।

 

          आवेदन फार्म और आवेदन प्रक्रिया तथा नियमों व शर्तों का पूर्ण विवरण मंत्रालय की वेबसाइट   www.mib.nic.in पर उपलब्ध है ।

 

म.प्र. राजद कार्यकारणी भंग: टिकट देने का लालच देकर उगाहे तीन-तीन हजार

म.प्र. राजद कार्यकारणी भंग: टिकट देने का लालच देकर उगाहे तीन-तीन हजार

याहू हिन्‍दी से साभार

Dec 05, 01:57 am

भोपाल। राष्ट्रीय जनता दल की प्रदेश कार्यकारिणी तत्काल प्रभाव से भंग हो गई है। जानकारी के अनुसार पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामदेव भंडारी ने प्रदेश अध्यक्ष ओपी सिंह पर कामकाज ठीक से नहीं करने के आरोप में कार्यकारिणी भंग की है। श्री भंडारी ने प्रदेश अध्यक्ष पर आरोप लगाया कि प्रदेश अध्यक्ष ने केन्द्रीय समिति की अनुमति के बिना पार्टी उम्मीदवारों को टिकट देने का लालच देकर उनसे उम्मीदवारों को तीन-तीन हजार रुपएवसूले हैं। इससे पार्टी के नाम पर धन का दुरुपयोग हुआ है। इसके साथ ही और भी कई गंभीर आरोप प्रदेश अध्यक्ष पर लगाए गए हैं।

 

 

 

December 04

निकटतम प्रतिद्वंदी होने का दावा छोटे दल भी देते हैं सीधी टक्कर पिछले चुनाव में 32 उतरे कसौटी पर

निकटतम प्रतिद्वंदी होने का दावा छोटे दल भी देते हैं सीधी टक्कर पिछले चुनाव में 32 उतरे कसौटी पर

भोपाल : तीन  दिसम्बर, 2008

 

चुनाव में किस्मत आजमाने सभी उम्मीदवार पूरे मन और  प्रयासों से चुनौती उठाते हैं। उम्मीदवार भले ही बड़े दल के हों या छोटे के या फिर निर्दलीय ही क्यूँ न हों, चुनाव जीतने की कोशिश और ख्वाहिश सभी की रहती है। इसके बावजूद किस्मत आजमाइश का फैसला कभी-कभी हालात की करवटें भी करती हैं। जीत न हासिल होने पर निकटतम प्रतिद्वंदी होना भी उम्मीदवारों के लिए इसलिए अहम होता है कि ऐसा मुकाम यह साबित करता है कि टक्कर सीधी दी गई है। सच्चाई यह भी है कि इस कसौटी पर कई बार छोटे दलों के और निर्दलीय उम्मीदवार भी पूरे उतरते हैं। प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में निकटतम प्रतिद्वंदी होने का दावा करने में ऐसे कुल 32 उम्मीदवार कामयाब हुए थे।

वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में सवर्ण समाज पार्टी और जनता पार्टी के एक-एक उम्मीदवार ने भी कुल दो सीटों पर निकटतम प्रतिद्वंदी का मुकाम हासिल किया था। इनमें से सवर्ण समाज पार्टी के उम्मीदवार ने मऊगंज विधानसभा क्षेत्र में निकटतम प्रतिद्वंदी के रूप में बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार को सीधी टक्कर दी थी। इसी तरह के हालात परसवाड़ा विधानसभा सीट पर बने जबकि जनता पार्टी (जेपी) के उम्मीदवार ने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार को निकटतम प्रतिद्वंदी के रूप में सीधी चुनौती दी थी।

अगले क्रम में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के तीन उम्मीदवारों की निकटतम प्रतिद्वंदी के रूप में बिछिया (अजजा) सीट पर भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार, निवास (अजजा) सीट पर भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार और लखनादौन (अजजा) सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार से सीधी टक्कर हुई थी। इसी चुनाव में समाजवादी पार्टी के सात उम्मीदवार और चार निर्दलीय उम्मीदवार भी निकटतम प्रतिद्वंदी बने थे। इनके अलावा, बहुजन समाज पार्टी के 16 उम्मीदवारों ने भी निकटतम प्रतिद्वंदी होने का मुकाम हासिल किया। प्रमुख दलों में भारतीय जनता पार्टी के 45 तो इंडियन नेशनल कांग्रेस के 153 उम्मीदवार उस चुनाव में निकटतम प्रतिद्वंदी बने थे।

 

चुनाव के दौरान 873 मामले सुलझे तत्काल की गई कार्रवाई 520 और अंतिम चरण में

चुनाव के दौरान 873 मामले सुलझे तत्काल की गई कार्रवाई 520 और अंतिम चरण में

भोपाल : तीन  दिसम्बर, 2008

 

मध्यप्रदेश में 13वीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव के दौरान विभिन्न किस्म की 873 शिकायतों के मामले निपटाए गए हैं। चुनाव की प्रशासनिक तैयारियों, सतत मानीटरिंग और विभिन्न व्यवस्थाएं सुनिश्चित किए जाने के बीच बड़ी तादाद में शिकायतों का निराकरण आयोग और इसकी राज्य इकाई की तत्परतापूर्ण कार्रवाई से मुमकिन हो सका। अब 520 और शिकायतों के सिलसिले में विभिन्न स्तरों पर चल रही कार्रवाई अंतिम चरण में पहुँच गई हैं। ये ऐसी शिकायतें हैं जो निरंतर मिलती रही हैं।

चुनाव के दौरान विभिन्न शिकायतें और अन्य प्रकरणों का निराकरण दो स्तरों पर यानि मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी और चुनाव आयोग द्वारा किया गया है। इनमें आदर्श आचरण संहिता के उल्लंघन, वोटर लिस्ट, मतदाता परिचय पत्र, मतदान केन्द्र, तबादले और अन्य प्रकार के मामले शामिल थे।

इस सिलसिले में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के दफ्तर ने अपने स्तर पर कुल 203 मामलों का निराकरण किया और शेष ऐसे 30 प्रकरणों में निराकरण की कार्रवाई अंतिम चरण में है। ये मामले विभिन्न विभागों से जुड़े हुए थे। इनके अलावा आयुक्त चंबल संभाग के जरिए 50 मामले, आयुक्त ग्वालियर 99, आयुक्त उज्जैन 53, आयुक्त इंदौर 75, आयुक्त भोपाल 121, आयुक्त नर्मदापुरम 25, आयुक्त सागर 37, आयुक्त जबलपुर 80, आयुक्त रीवा 85 और आयुक्त शहडोल संभाग 41 तथा अन्य संस्थानों के जरिए 4 मामले निपटाए गए।

 

चुनाव आयोग की सहृदयता रीना केवट को दिलाई इलाज की मदद

चुनाव आयोग की सहृदयता रीना केवट को दिलाई इलाज की मदद

भोपाल : तीन  दिसम्बर, 2008

 

भारत निर्वाचन आयोग ने सतना जिले की रीना केवट को गंभीर बीमारी के इलाज के लिए राज्य बीमारी सहायता निधि से एक लाख 10 हजार रुपए की सहायता दिए जाने का अनुमोदन किया है। आयोग ने आदर्श आचरण संहिता पर अमल की गाईड लाइन में यद्यपि पहले ही यह स्पष्ट किया हुआ है कि अत्यंत गंभीर बीमार लोगों को दी जा सकने वाली किसी सरकारी इमदाद पर इस दौरान रोक नहीं रहेगी। बहरहाल, जब यह मामला आयोग के ध्यान में लाया गया तो फौरन उसने इस पर रजामंदी की मुहर लगाई।

सतना जिले के गौहारी ग्राम की रीना के पिता केदार प्रसाद केवट ने आयोग को पत्र लिखकर इस राशि को स्वीकृत करवाने का अनुरोध किया था। उनकी पुत्री के हृदय के दोनो वाल्ब खराब हो चुके थे और इलाज की तात्कालिक आवश्यकता आन पड़ी थी। श्री केवट की पुत्री के इस प्रकरण में सतना जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने स्थिति के मद्देनज़र ईलाज के लिए राज्य बीमारी सहायता निधि से संचालनालय स्वास्थ्य सेवा को एक लाख 10 हजार रुपए देने की अनुशंसा की थी। संचालनालय ने इस पर आयोग की पूर्व मंजूरी को जरूरी बताया था। श्री केवट ने  इस मामले में देरी न करते हुए सीधे आयोग को अनुमति देने संबंधी आवेदन प्रस्तुत किया।

आयोग ने तत्काल मामले का परीक्षण करवाया और प्रकरण की वस्तुस्थिति से अवगत होते ही स्वास्थ्य संचालनालय को इलाज के लिए उक्त राशि मंजूर करने की इजाजत दे दी। रीना केवट का इलाज शुरू हो चुका है।

 

December 03

वैश्विक प्रयासों से ही संभव है आतंकवाद से छुटकारा

वैश्विक प्रयासों से ही संभव है आतंकवाद से छुटकारा

तनवीर जांफरी   (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी, शासी परिषद) email:   anveerjafri1@gmail.com tanveerjafri58@gmail.com  tanveerjafriamb@gmail.com  22402, नाहन हाऊस अम्बाला शहर हरियाणा

       भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में देखा जाने वाला मुंबई महानगर जुलाई 2006 में हुए सिलसिलेवार ट्रेन धमाकों को अभी पूरी तरह भुला भी नहीं पाया था कि गत् 26 नवम्बर की रात एक बार फिर इस ऐतिहासिक महानगर को आतंकवादियों ने दहला कर रख दिया। परन्तु इस बार मुंबई पर आतंकवादियों द्वारा किया गया यह हमला भारत में अब तक हुए आतंकवादी हमलों में सबसे बड़ा, सबसे ंखतरनाक, सबसे अधिक सुनियोजित तथा बहुउद्देशीय आक्रमण था। हमलावरों द्वारा 26 नवम्बर की इस घटना को अंजाम देने के पीछे केवल लोगों को जानमाल की क्षति पहुंचाना ही नहीं था बल्कि उनका मंकसद पूरी दुनिया को यह संदेश देना भी था कि दुनिया का कोई भी अतिसुरक्षित समझा जाने वाला स्थान भी उनके निशाने से बच नहीं सकता। और यह भी कि पर्यटक कहीं भी रहें, वे आतंकियों के निशाने से बच नहीं सकते। इसके अतिरिक्त भारतीय पर्यटन को प्रभावित कर हमारे देश की अर्थव्यवस्था को कमंजोर करने का भी आतंकवादियों द्वारा प्रयास किया गया है। इन सबसे अलग यदि इस बार हमलावरों द्वारा उनके निशाने पर लिए गए स्थलों पर नंजर डालें तो हमें लगेगा कि मानवता के इन दुश्मनों ने इस आक्रमण के द्वारा भारतीय विरासत को नष्ट करने एवं देश के स्वाभिमान को ललकारने का भी दुस्साहस किया है।

              आतंकवादियों द्वारा 26 नवम्बर की रात लगभग पौने दस बजे सर्वप्रथम कैंफे लियोपोल्ड से आतंकी हमले की शुरुआत की गई। 1871 में स्थापित किए गए इस कैंफे में आमतौर से विदेशी नागरिक एवं सैलानी आते रहते हैं। यह पुरानी मुंबई का एक अत्यन्त लोकप्रिय रेस्तरां है। इसके पश्चात आतंकियों द्वारा बॉम्बे वी टी के नाम से तथा अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के नाम से मशहूर मुंबई के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन को अपना निशाना बनाते हुए वहां यात्रियों की भीड़ पर धुंआधार गोलियां चलाई तथा हथगोले फेंके। इस रेलवे स्टेशन का निर्माण 1878 में किया गया था। अपनी स्थाप्तय कला के लिए विश्वप्रसिद्ध देश के इस सबसे व्यस्त रेल टर्मिनल को 2004 में युनेस्को द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय विरासत घोषित किया गया था। इसी प्रकार मुंबई में अरब सागर के तट पर बने 105 वर्ष पुराने ताज महल पैलेस होटल को भी आतंकियों ने अपनी बुरी नंजर का शिकार बनाया। ताज होटल, गेटवे ऑंफ इंडिया के समीप स्थित है। यहां से समुद्र का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। इसी प्रकार मुंबई के एक अन्य लोकप्रिय होटल ओबेरॉय (अब ट्राइडेन्ट) पर भी आतंकियों ने धावा बोला। इसके अतिरिक्त कामा एण्ड एलेबेलस हॉस्पिटल तथा नरीमन हाऊस जैसी प्राचीन इमारतों को भी आतंकियों ने अपना निशाना बनाया। कामा हॉस्पिटल का निर्माण 1880 में एक अमीर व्यापारी द्वारा कराया गया था। जबकि नरीमन हाऊस यहूदियों का एक ऐसा प्रमुख केंद्र है जहां कि यहूदी पर्यटक भी ठहरा करते थे। इस भवन में यहूदी धर्म ग्रन्थों का एक विशाल पुस्तकालय तथा इनका आराधना स्थल भी है।

              आतंकवादियों द्वारा होटल ताज, होटल ओबेरॉय तथा नरीमन हाऊस जैसे ऐतिहासिक एवं आलीशान भवनों पर ंकब्ंजा जमा लिया गया था तथा तीनों स्थानों पर सैकड़ों लोगों को बंधक बना लिया गया था। देश के इस सबसे बड़े आतंकवादी हमले में 200 से अधिक लोगों के मारे जाने का समाचार है जबकि इसमें लगभग 400 व्यक्ति घायल भी हुए हैं। इस आतंकी हमले को विफल करने के लिए भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा अपनी पूरी तांकत झोंक दी गई थी। महाराष्ट्र पुलिस के अतिरिक्त आतंकवादी निरोधक दस्ता (ए टी एस), राष्ट्रीय सुरक्षा गॉर्ड्स (एन एस जी), भारतीय सेना तथा भारतीय जल सेना के विशेष प्रशिक्षित कमांडो ने ऑप्रेशन ब्लैक टॉर्नेडो नामक इस आतंक विरोधी अभियान में भाग लिया। तीन दिन लगातार आतंकवादियों के साथ चली इस मुठभेड़ में आतंकवादियों के हौसलों तथा उनकी तैयारी का अंदांजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पूरे ऑप्रेशन के दौरान जहां कई सुरक्षाकर्मी व कमांडो आतंकियों की गोली से शहीद हुए, वहीं देश के 4 होनहार उच्च सुरक्षा अधिकारी भी इस ऑप्रेशन में शहीद हो गए। शहीद होने वाले अधिकारियों में सर्वप्रमुख नाम ए टी एस के प्रमुख हेमंत करकरे का था। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिस प्रकार 911 का अमेरिका में हुआ आतंकी हमला विश्व का अब तक का सबसे बड़ा व सुनियोजित आतंकी षडयंत्र था, ठीक उसी प्रकार 26 नवम्बर को मुंबई में हुआ आतंकी आक्रमण देश का अब तक का सबसे बड़ा व ंखतरनाक आतंकवादी हमला था।    

                               बेशक अमेरिका को लगभग सभी क्षेत्रों में विश्व का एक अग्रणी, आधुनिक व शक्तिशाली राष्ट्र माना जाता है। नि:सन्देह 911 के बाद भले ही अमेरिका में कोई बड़ी आतंकवादी घटना न घटित हो पाई हो। परन्तु इसमें भी कोई शक नहीं कि अमेरिका जैसा देश भी 911 जैसे अकल्पनीय आतंकी षडयंत्र को टाल नहीं सका। भारत में भी जहां अनेकों धर्मस्थलों, बांजारों तथा अन्य प्रमुख प्रतिष्ठानों को आतंकी निशाना बनने से नहीं रोका जा सका, वहीं संसद भवन जैसा अतिसुरक्षित भवन भी आतंकियों की चपेट में आने से नहीं बच पाया। इसी प्रकार पाकिस्तान में जहां बेनंजीर भुट्टो को पूर्व चेतावनी देकर आतंकवादियों ने शहीद कर दिया, वहीं पाकिस्तान के अति सुरक्षित होटल मैरियट को भी अभी कुछ ही समय पूर्व आतंकवादियों ने अपना निशाना बनाया। यहां तक कि लंदन की अति सुरक्षित भूमिगत रेल सेवा को भी यह आतंकी अपनी निशाने पर ले चुके हैं। फ्रांस तथा स्पेन में भी मानवता के दुश्मन यही आतंकी ंखूनी खेल खेल चुके हैं। कहना ंगलत नहीं होगा कि भारत व पाकिस्तान में आतंकवादी हमले तो अब दिनचर्या में शामिल होने वाले घटनाक्रम जैसे प्रतीत होने लगे हैं।

              सवाल यह है कि गत् एक दशक से विभिन्न देशों में हो रहे इन आतंकी आक्रमणों का आंखिर कोई समाधान सम्भव भी है या नहीं? 911, भारतीय संसद पर हमला तथा तांजातरीन 26 नवम्बर की मुंबई की घटना आदि हादसे क्या हमें यह सोचने के लिए मजबूर नहीं करते कि अब शायद दुनिया की कोई भी जगह आतंकवादियों की पहुंच से बाहर नहीं रहीं? मानवता के यह दुश्मन क्या अपनी मंर्जी के मुताबिक तथा अपनी योजना के अनुसार जब चाहें, जहां चाहें और जैसे चाहें किसी भी बेगुनाह इंसान के जीवन से खिलवाड़ करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं? क्या देश और दुनिया की राजनीति करने वाले राजनेताओं के पास ऐसे कोई उपाय नहीं कि वे आतंकवाद जैसे नासूर से आम लोगों को मुक्ति दिलवा सकें। परन्तु आतंकवादी समस्या से निपटने के गंभीर एवं पारदर्शी वैश्विक स्तर के प्रयासों की बात तो दूर, यहां तो ऐसी घटना के घटित होते ही राजनैतिक लोग इन घटनाओं में भी अपने राजनैतिक नंफे नुक्सान की संभावनाएं तलाशने लग जाते हैं। बिना समय गंवाए राजनेता बेगुनाहों की लाशों पर राजनीति करना शुरु कर देते हैं। कभी भारत में ही कोई राजनैतिक दल किसी दूसरे राजनैतिक दल को आतंकी घटना का ंजिम्मेदार ठहराने लगता है। और कभी भारत व पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश एक दूसरे को संदेह की निगाह से देखने लग जाते हैं। ंजाहिर है आरोपों-प्रत्यारोपों तथा आतंकवाद पर राजनीति किए जाने के परिणामस्वरूप भले ही राजनैतिक दल सनसनी या नंफरत फैलाकर इन घटनाओं का क्षणिक रूप से कुछ लाभ क्यों न उठा लें परन्तु निश्चित रूप से इन विरोधाभासों से आतंकवादियों के हौसले बुलंद होते हैं तथा किसी एक देश में एक बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के बाद यही आतंकवाद किसी अन्य देश में दूसरे बड़े हमले की योजना बनाने में व्यस्त हो जाते हैं।

              ऐसे में ंजरूरत है ऐसे पारदर्शी, सकारात्मक, ठोस तथा रचनात्मक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के उन उपायों की जोकि आतंकवाद, आतंकवादियों, उनके ठिकानों तथा उनकी मदद करने वाले सभी स्रोतों यहां तक कि आतंकवादियों को मानसिक रूप से तैयार करने वाले तथाकथित वैचारिक स्रोतों को भी जड़ से नष्ट कर सकें। नि:सन्देह पाकिस्तान इस समय स्वयं आतंकवाद की बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। वहां आतंकवादी घटनाएं तो आम सी बात बनकर रह गई है। परन्तु इसमें भी कोई शक नहीं कि आतंकवादियों के सबसे अधिक व सबसे संगीन ठिकाने व प्रशिक्षण शिविर भी पाकिस्तान में ही हैं। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादी केवल भारत के ही हितों को नुंकसान पहुंचाएगा। मानवता का दुश्मन बन चुका यह आतंकी जहां भी जाएगा, समूची मानवता को आहत करेगा। चाहे वह अमेरिका में किसी घटना को अंजाम देने के षडयंत्र में शामिल हो, पाकिस्तान में या फिर भारत में।

              अत: यदि आतंकवाद जैसे नासूर का समूल नाश करना है तो समस्त आतंकवाद प्रभावित देशों को संगठित होकर इन मुट्ठी भर इंसानी दुश्मनों के विरुद्ध पूरी पारदर्शिता के साथ तथा बिना किसी धर्म-जाति व देश का लिहांज किए सांझी, कारगर व उपयोगी एक ऐसी रणनीति बनानी होगी जिससे कि इनका पूरी तरह से संफाया किया जा सके। इतिहास में ऐसे एक नहीं अनेकों प्रमाण हैं कि यदि किसी देश ने अथवा किसी संगठन ने अपने राजनैतिक लाभ के मद्देनंजर आतंकवाद को प्रोत्साहन दिया है तो आने वाले समय में उसी संगठन अथवा उसी देश को उसी के द्वारा सींचे गए आतंकवाद ने ही गहरी चोट भी पहुंचाई। अत: किसी भी देश, संगठन अथवा विचारधारा को यह बात पूरी तरह से अपने दिमांग से निकाल देनी चाहिए उनकी द्वारा सींची जाने वाली तथा प्रोत्साहित की जाने वाली आतंकवाद रूपी बेल केवल पड़ोसियों को ही जकड़ेगी, स्वयं उन्हें नहीं। ऐसा हरगिंज नहीं है। यदि कोई ऐसा सोचता है तो यह महंज उसकी ंगलतंफहमी है। प्रार्थना की जानी चाहिए कि 26 नवम्बर जैसे भयावह हादसे की पुनरावृत्ति भारत ही क्या दुनिया में कहीं भी नहीं हो। परन्तु अपनी इन प्रार्थनाओं को साकार करने हेतु निश्चित रूप से आज ंजरूरत है मात्र आतंकवाद का विरोध किए जाने के एक विश्वस्तरीय संकल्प की एवं ऐसे विश्वस्तरीय पारदर्शी प्रयासों की जोकि हमें तथा समूची मानवता को इस वर्तमान वैश्विक आतंकवाद से निजात दिलवा सकें।

एक था राजा......

एक था राजा......

निर्मल रानी 163011, महावीर नगर,  अम्बाला शहर,हरियाणा

       देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह गत् 27 नवम्बर को 77 वर्ष की आयु में अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर हम सभी को अलविदा कह गए। 25 जून 1930 को इलाहाबाद में जन्मे तथा बाद में राजा मांडा के नाम से प्रसिद्ध हुए वी पी सिंह को गत् 17 वर्षों से रक्त कैंसर जैसा गंभीर रोग था। परन्तु इसके बावजूद भी वे किसानों तथा कामगारों से जुड़ी समस्याओं को लेकर अब भी आन्दोलन करते दिखाई देते थे। श्रीमती इंदिरा गांधी के किसी समय अत्यधिक वंफादार समझे जाने वाले वी पी सिंह को राजा साहब कहकर भी पुकारा जाता था। राष्ट्रीय राजनीति में सर्वप्रथम उनका परिचय इंदिरा जी ने ही उन्हें अपने मंत्रिमंडल में वाणिज्य राज्य मंत्री का पद देकर कराया था। इसके पश्चात आपातकाल के दौरान भी जब बाबू जगजीवन राम व हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता श्रीमती गांधी का साथ छोड़कर चले गए थे, उस समय वी पी सिंह, इंदिरा जी के साथ डटकर खड़े रहे। ंजाहिर है राजा साहब को इसका पुरस्कार भी अवश्य मिलना था। 1979में जब कांग्रेस पुन: सत्ता में आई उस समय इंदिरा जी ने राजा साहब को उत्तर प्रदेश की कांग्रेस पार्टी में सक्रिय किया तथा उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष का पद सौंपा। कालान्तर में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस भारी बहुमत से विजयी हुई। और इस प्रकार श्रीमती इंदिरा गांधी ने वी पी सिंह को अपनी पहली पसंद के रूप में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त किया।

              नि:सन्देह राजा साहब उत्तर प्रदेश के एक सफल मुख्यमंत्री के रूप में अपना शासन चला रहे थे। परन्तु इसमें भी कोई शक नहीं कि वी पी सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल का दौर प्रदेश की ंकानून व्यवस्था के लिए एक बड़ा ही चुनौतीपूर्ण दौर था। यही वह दौर था जबकि बेहमई कांड हो चुका था तथा फूलन देवी चंबल की दस्यु सरगना के रूप में सामने आ चुकी थी। इसी दौर में बांदा तथा चित्रकूट के जंगलों में छुपे रहने वाले ददुआ डाकू का पूरा आतंक व्याप्त था। यहां तक कि इन्हीं के मुख्यमंत्रित्वकाल में ंकानून व्यवस्था तथा अराजकता ने अपना इतना विकराल रूप धारण कर लिया था कि स्वयं मुख्यमंत्री के अपने भाई सी एस पी सिंह जोकि उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे, की भी बांदा के जंगलों में डाकुओं द्वारा घात लगाकर हत्या कर दी गई। इस हत्या ने वी पी सिंह को विचलित कर दिया। इसके पहले कि विपक्ष यह कहने का साहस करता कि वी पी के शासनकाल में उन्हीं के भाई की डाकुओं द्वारा हत्या की गई है, ऐसे में आम नागरिकों की सुरक्षा की कौन गारंटी ले। परन्तु विपक्ष को यह कहने का अवसर देने के बजाए राजा साहब ने तत्काल मुख्यमंत्री के पद से स्वयं ही त्यागपत्र दे दिया। हालांकि राजा साहब का अचानक त्यागपत्र देना इंदिरा जी को अच्छा नहीं लगा। ऐसा इसलिए था क्योंकि मुख्यमंत्री का पद त्यागने से पूर्व राजा साहब ने इंदिरा जी को अपने इस ंफैसले से अवगत नहीं कराया था।

              बहरहाल, समय बीता। स्वयं इंदिरा जी की भी हत्या हो गई। देश में आम चुनाव हुए। राजीव गांधी राजनीति में सक्रिय हुए तथा उनके राजनीति में पदार्पण करते ही उन्हें प्रधानमंत्री का पद मिल गया। उधर इसी दौरान वी पी सिंह भी इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र (56) से लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। राजीव गांधी ने इंदिरा जी की हत्या के बाद वी पी सिंह को पहले अपने मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री के पद पर सुशोभित किया। इस दौरान बड़े औद्योगिक घराने तथा आयकर आदि के कुछ मामलों को लेकर राजा साहब का राजीव गांधी से कुछ मतभेद शुरु हो गया। इसके पश्चात राजीव गांधी ने अपने अगले मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री का पद इनसे लेकर इन्हें रक्षा मंत्रालय का पदभार सौंप दिया। रक्षा मंत्री बनते ही राजा साहब को बोंर्फोस तोप सौदे संबंधी कुछ जानकारियां प्राप्त हुई बताई जाती हैं।

              बस फिर क्या था। वी पी सिंह को तो मानो अपने लक्ष्य तक पहुंचने का एक सटीक, प्रभावी तथा मंजबूत रास्ता मिल गया। बिना समय गंवाए वी पी सिंह ने सीधे राजीव गांधी व उनके कुछ सहयोगियों पर बोंर्फोस तोप सौदे में दलाली खाने जैसे गंभीर आरोप लगा दिए। इसी के साथ-साथ इन्होंने पहले रक्षा मंत्री का पद छोड़ा फिर लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दिया और बाद में कांग्रेस पार्टी भी छोड़ दी। राजीव गांधी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने में उस समय जिन तीन प्रमुख नेताओं ने वी पी सिंह का साथ दिया, उनमें मुंफ्ती मोहम्मद सईद, अरुण नेहरु व आरिंफ मोहम्मद ंखान के नाम शामिल हैं। इन सभी ने मिलकर कांग्रेस पार्टी पर यहां तक कि सीधे राजीव गांधी पर निशाना साधना शुरु कर दिया। इस राजनैतिक घटनाक्रम को लेकर पूरे देश के कांग्रेस विरोधी दल अत्यन्त उत्साहित हुए। उन्हें एक प्रकार से कांग्रेस का 'विभीषण' मिल गया। उधर भीतर ही भीतर राजा साहब भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपनी नंजरें गड़ाकर अपनी राजनैतिक शतरंज बिछाने लगे।

 

सर्वप्रथम कांग्रेस छोड़ने के बाद वी पी सिंह ने इल